भारत के पर्यावरण संरक्षण आंदोलनों का संक्षिप्त परिचय

भारत के पर्यावरण संरक्षण आंदोलनों का संक्षिप्त परिचय– भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व मे पर्यावरण की रक्षा हेतु चलाए गए  विभिन्न आंदोलनों का मुख्य कारण पर्यावरण के विनाश के कारण लोगों के सामने उत्पन्न हो रही विभिन्न समस्याएँ ही रही है।

यदि भारत के इतिहास पर नजर डाली जाए, विशेष रूप से पिछले 200 से 300 वर्षों के इतिहास पर तो हमें अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब पर्यावरण प्रेमियों और पर्यावरणविदों  से लेकर के आम जनमानस तक सभी लोग पर्यावरण के विभिन्न तत्वों वृक्षों, नदियों, वन क्षेत्रों, जैव विविधता आदि विभिन्न घटकों को बचाने के लिए शासन एवं प्रशासन के विरुद्ध आंदोलित होते रहे हैं।

अनेक ऐसे आंदोलन भी है जिसमें लोगों ने पर्यावरण को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति भी दी है। इनमे राजस्थान में शुरू हुआ बिश्नोई आंदोलन सर्वाधिक प्रसिद्ध है।

भारत के पर्यावरण संरक्षण आंदोलनों का संक्षिप्त परिचय

 

इन आंदोलनों के पीछे का कारण जैसा कि पूर्व में ही बताया गया है कि पर्यावरण का विनाश है।  पर्यावरण के विनाश के संदर्भ में यदि भारत की बात की जाए तो इसका कारण अंग्रेजों द्वारा अपनायी गयी विकास की असंतुलित प्रक्रिया है, और आज के वैज्ञानिक युग मे भी जहां मानव जगत मे विज्ञान मे इतनी अधिक प्रगति कर ली है, फिर भी हम अपनी अधिकतर जरूरतों की पूर्ति पर्यावरण के विभिन्न घटकों का दोहन करके ही कर रहे हैं। 

 

मनुष्यों द्वारा अपनायी गयी असंतुलित विकास की इस प्रक्रिया मे, जिसमें पर्यावरण के प्राकृतिक घटकों की सुरक्षा, उनके महत्व और उनके अस्तित्व की परवाह किए बगैर सिर्फ अपने भौतिक सुखों एवं सुविधाओं की चिंता करके मानव जगत ने प्रकृति का इतना अधिक दोहन कर लिया है कि आज पर्यावरण के तीनों मुख्य क्षेत्र, प्रकृति के तीनों मुख्य क्षेत्र जल, थल एवं नभ तीनों ही प्रदूषित एवं शोषित हो चुके हैं। 

इस असंतुलित विकास प्रक्रिया के अनेक दुष्प्रभावों ने पर्यावरणविदों से लेकर के आम जनमानस तक को पिछले कुछ समय से एकजुट होने और विकास को पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए अनेक आंदोलन चलाने को प्रेरित किया है जिनमें से मुख्य आंदोलन निम्नलिखित हैं-

भारत के पर्यावरण संरक्षण आंदोलनों का संक्षिप्त परिचय

1. बिश्नोई आंदोलन

बिश्नोई भारत का एक धार्मिक सम्प्रदाय है जिसके अनुयायी राजस्थान,हरियाणा, पंजाब, उतरप्रदेश और मध्यप्रदेश आदि प्रदेशों में पाये जाते हैं। श्रीगुरु जम्भेश्वर को बिश्नोई पंथ का संस्थापक माना जाता हैं जिन्हें जम्भाजी के नाम से भी जाना जाता हैं। इस सम्प्रदाय के संस्थापक ने अपने अनुयायियों के लिए 29 नियम दिये गये थे। ‘बिश्नोई‘ दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है: बीस + नो अर्थात जो उनतीस नियमों का पालन करता है। इन्हीं 29 नियमों अर्थात बीस और नौ के कारण ही इस सम्प्रदाय का नाम बिश्नोई पडा।

 

यह प्रकृति पूजकों का अहिंसात्मक समुदाय है। यह आंदोलन वनों की कटाई के खिलाफ 15वीं सदी के आसपास ऋषि जम्भाजी द्वारा राजस्थान में शुरू किया गया था। उसके बाद राजस्थान के खिजड़ी गांव की अमृता देवी बिश्नोई ने संत जम्भाजी से प्रेरित होकर इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। उन्होंने अपनी तीन बेटियों संग वृक्षों को काटने से रोकने के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी। इसी क्रम में देखते देखते बिश्नोई समुदाय के 363 लोगों ने वृक्षों को बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान किया।

उसके बाद जब जोधपुर के राजा अजीत सिंह को विश्नोई समुदाय के लोगों के विरोध और अपने प्राणों के बलिदान का पता चला तो वह गाँव गये और माफी मांगकर अपने आदेश को वापस ले लिया तथा क्षेत्र को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया। उल्लेखनीय है कि यह कानून आज भी मौजूद है। आगे चलकर इस आंदोलन ने लोगों को चिपको आन्दोलन  के लिए प्रेरित किया।

2. चिपको आन्दोलन

भारत के पर्यावरण संरक्षण आंदोलनों का संक्षिप्त परिचय

 

यह एक पर्यावरण-रक्षा का आन्दोलन था जिसे 1973 ईस्वी में भारत के उत्तराखण्ड राज्य (तब उत्तर प्रदेश का भाग) में चमोली जिले के गोपेश्वर में किसानो ने वृक्षों की कटाई का विरोध करने के लिए किया था। इस आंदोलन के प्रणेता श्री चंडी प्रसाद भट्ट थे और श्री सुंदरलाल बहुगुणा उनके प्रमुख सहयोगी। वे राज्य के वन विभाग के ठेकेदारों द्वारा वनों की कटाई का विरोध कर रहे थे और उन पर अपना परम्परागत अधिकार जता रहे थे।  इस आंदोलन की सबसे उल्लेखनीय विशेषताएं महिलाओं की भागीदारी थी।

Note: यहां ध्यान देने योग्य बात है कि परीक्षा प्रश्नों में श्री चंडी प्रसाद भट्ट का नाम न होने पर सुंदरलाल बहुगुणा को भी इस आंदोलन का प्रणेता माना जाता है। सुंदरलाल बहुगुणा टिहरी बांध आंदोलन के भी जनक थे।

3. साइलेंट वैली आंदोलन

 

Silent vally आंदोलन

 

केरल की साइलेंट वैली (शांत घाटी) 89 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है जो अपनी घनी जैव-विविधता के लिए मशहूर है। 80 के दशक में यहाँ कुंतीपूंझ नदी पर एक परियोजना के अंतर्गत 200 मेगावाट बिजली निर्माण हेतु बांध का प्रस्ताव रखा गया था। केरल सरकार इस परियोजना के लिए बहुत इच्छुक थी लेकिन 1973 ईस्वी में इस परियोजना के विरोध में वैज्ञानिकों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं तथा क्षेत्रीय लोगों के स्वर गूंजने लगे।

इनका मानना था कि इससे इस क्षेत्र के कई विशेष फूलों, पौधों तथा लुप्त होने वाली प्रजातियों को खतरा है। इसके अलावा यह पश्चिमी घाट की कई सदियों पुरानी संतुलित पारिस्थिति की को भारी हानि पहुँचा सकता है। दबाव में, सरकार द्वारा 1985 में इसे राष्ट्रीय पार्क घोषित कर दिया गया। यह राष्ट्रीय उद्यान केरल के पलक्कड़ जिला में स्थित है।

4. नर्मदा बचाओ आंदोलन

भारत के पर्यावरण संरक्षण आंदोलनों का संक्षिप्त परिचय- नर्मदा बचाओ आंदोलन

यह आंदोलन भारत में चल रहे पर्यावरण आंदोलनों की परिपक्वता का उदाहरण है। इसने पहली बार पर्यावरण तथा विकास के संघर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनाया जिसमें न केवल विस्थापित लोगों बल्कि वैज्ञानिकों, गैर सरकारी संगठनों तथा आम जनता की भी भागीदारी रही। इस आंदोलन का उद्देश्य नर्मदा नदी के ऊपर बनाई जा रही बहुउद्देशीय बांध परियोजना को पर्यावरण मानकों के अनुरूप स्वीकृत कराना था।

नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध परियोजना का उद्घाटन 1961 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने किया था। लेकिन तीन राज्यों-गुजरात, मध्य प्रदेश तथा राजस्थान के मध्य एक उपयुक्त जल वितरण नीति पर कोई सहमति नहीं बन पायी। 1969 में, सरकार ने नर्मदा जल विवाद न्यायधिकरण का गठन किया ताकि जल संबंधी विवाद का हल करके परियोजना का कार्य शुरु किया जा सके।

पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों ने 1985 से हाइड्रो-बिजली के उत्पादन के लिए नर्मदा पर बांधों के निर्माण के खिलाफ विरोध शुरू कर दिया था, जिसे नर्मदा बचाओ अनंदोलन के नाम से जाना जाता था। मेधा पाटेकर इस आंदोलन की प्रणेता रही, जिन्होंने इस आंदोलन को 1989 ईस्वी में शुरू किया था।  जिन्हें अरुंधति रॉय, बाबा आमटे और आमिर खान का समर्थन मिला।

5. अप्पिको आंदोलन

यह आंदोलन भी चिपको आंदोलन की तरह पर्यावरण संरक्षण के लिये चलाया गया एक क्रांतिकारी आन्दोलन था या फिर दुसरे शब्दों में कहे तो उत्तर का चिपको आंदोलन दक्षिण में ‘अप्पिको’ आंदोलन के रूप में उभरकर सामने आया था। यह आंदोलन अगस्त, 1983 में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ क्षेत्र में शुरू हुआ था। यह आन्दोलन वनों की सुरक्षा के लिए कर्नाटक में पांडुरंग हेगडे के नेतृत्व में शुरू हुआ था। इस आंदोलन का नारा था – उलिसु बेलेसु मत्तू बलिसु अर्थात् बचाओ, बढ़ाओ और काम में लाओ। 

6. नवदान्या आंदोलन 

इस आंदोलन की शुरुआत 1982 में वंदना शिवा के द्वारा की गई थी। नवदान्या के वसुधैव कुटुंबकम अर्थात धरती के गणतंत्र और “सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है” पर आधारित इस आंदोलन का उद्देश्य जैविक खेती के लिए व्यक्तियों को प्रशिक्षित करना, बीज स्वराज, अन्न स्वराज, भू स्वराज और ज्ञान स्वराज के माध्यम से भारत की जैव विविधता और उसकी विरासत की रक्षा करना था।

7. जंगल बचाओ आंदोलन

इस आंदोलन की शुरुआत 1980 में वर्तमान झारखंड अर्थात् तब के बिहार और उड़ीसा से हुई थी। 1980 में सरकार ने बिहार के जंगलों में प्राकृतिक रूप से मौजूद साल के वृक्षों को काटकर मूल्यवान सागौन के वृक्षों के जंगल में बदलने की योजना पेश की, और इसी योजना के विरुद्ध बिहार के सभी आदिवासी कबीले एकजुट हुए और उन्होंने अपने जंगलो को बचाने के लिए एक आन्दोलन चलाया। इसे ‘जंगल बचाओ आंदोलन’ का नाम दिया गया था। कई पर्यावरणविद इस आंदोलन को “राजनैतिक लालच का खेल और लोकलुभावनवाद” कहते हैं।

8. टिहरी बांध विरोधी आंदोलन

टिहरी बांध उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में भागीरथी और भिलंगना नदी पर बनने वाला ऐशिया का सबसे बड़ा तथा विश्व का पांचवा सर्वाधिक ऊँचा (अनुमानित ऊँचाई 260.5 मी०) बांध है। इसके निर्माण की स्वीकृति 1972 में योजना आयोग ने दी थी। ऐसा अनुमान है कि टिहरी जलविद्युत परिसर के पूर्ण होने पर यहाँ से प्रतिवर्ष 620 करोड़ यूनिट बिजली का उत्पादन होगा जो दिल्ली तथा उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों के लोगों को बिजली तथा पेयजल की सुविधा उपलब्ध करायेगा।

इस परियोजना का सुंदरलाल बहुगुणा तथा अनेक पर्यावरणविदों ने कई आधारों पर विरोध किया है। इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हैरिटेज द्वारा टिहरी बांध के मूल्याकंन की रिपोर्ट के अनुसार यह बांध टिहरी कस्बे और उसके आसपास के 23 गांवों को पूर्ण रूप से तथा 72 अन्य गांव को आंशिक रूप से जलम, न कर देगा, जिससे 85600 लोग विस्थापित हो जाएंगे।

इसी तरह सम्पूर्ण भारत के विभिन्न हिस्सों मे पर्यावरण की रक्षा के लिए अनेक आन्दोलन चलाये गए हैं, उन आंदोलनो मे अनेक ऐसे आंदोलन भी हैं, जिनका विस्तार और जिनकी प्रासंगिकता सीमित क्षे

त्रों मे होने के कारण उन्हे व्यापक स्तर पर पहचान नहीं मिली, परंतु इन छोटे छोटे आंदोलनों का महत्त्व भी कम नहीं है। अनेक ऐसे आंदोलन भी रहे हैं, जिन्हे अपने उद्देश्यों की पूर्ति मे सफलता नहीं मिली। 

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