नवीनतम शास्त्रीय भाषा- भारत सरकार का फैसला, 3 भाषाएँ और होंगी शास्त्रीय भाषा में शामिल

नवीनतम शास्त्रीय भाषा

नवीनतम शास्त्रीय भाषा– हाल ही में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने 2 दिवसीय ईरान दौरे पर घोषणा की है कि देश में नई शिक्षा नीति 2020 के तहत फारसी समेत 3 नई भाषाओँ को शास्त्रीय भाषा में शामिल किया जायेगा. इसके बाद अब देश में शास्त्रीय भाषाओँ की संख्या 9 हो जाएगी. इसका पहले वर्ष 2014 में आखिरी बार ओडिया को 6वीं शास्त्रीय भाषा के रूप में शामिल किया गया था.

नवीनतम शास्त्रीय भाषा- प्राकृत, पाली और फारसी

विदेश मंत्री एस जयशंकर हाल ही में ईरान के दौरे पर गए थे. अपने ईरानी समकक्ष एच अमीर-अब्दुल्लाहियन के साथ एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन के दौरान जयशंकर ने बताया कि केंद्र सरकार ने फैसला किया है कि नई शिक्षा नीति 2020 के तहत प्राकृत, पाली और फारसी को शास्त्रीय भाषा की मान्यता दी जाएगी. इन भाषाओँ को शास्त्रीय भाषा के रूप में मान्यता देने से भारतीय शैक्षिक ढांचे के भीतर इन भाषाओँ की समृद्ध विरासत की समझ और सराहना को बढ़ावा मिलेगा।

इस प्रकार देश को 7वीं और 8वीं शास्त्रीय भाषा के रूप में प्राकृत और पाली तथा 9वीं शास्त्रीय भाषा के रूप में फारसी मिल जाएगी.

भारत की पहली शास्त्रीय भाषा कौन सी थी

भारत में भाषाओँ को शास्त्रीय भाषा की मान्यता देने की शुरुआत वर्ष 2004 में हुई थी. तब पहली बार तमिल को शास्त्रीय भाषा की मान्यता दी गई थी. इसलिए तमिल भारत की पहली शास्त्रीय भाषा है. इसके बाद वर्ष 2005 में संस्कृत को दूसरी शास्त्रीय भाषा के रूप में मान्यता दी गई थी. जबकि अभी तक आखिरी बार वर्ष 2014 में किसी भाषा को शास्त्रीय भाषा की मान्यता दी गई थी. तब ओड़िया को भारत की 6वीं शास्त्रीय भाषा के रूप में मान्यता मिली थी.

इसके अलावा कन्नड़ और तेलुगु को वर्ष 2008 में और मलयालम को वर्ष 2013 में भारत की शास्त्रीय भाषा के रूप में मान्यता मिली थी.

शास्त्रीय भाषा घोषित करने के लिए आवश्यक मानदंड

संस्कृति मंत्रालय किसी भाषा को शास्त्रीय भाषा घोषित करने के लिये जिन मानदंडों का प्रयोग करता है वो निम्नलिखित हैं-

  • इसके प्रारंभिक ग्रंथों का इतिहास 1500-2000 वर्ष से अधिक पुराना हो
  • प्राचीन साहित्य/ग्रंथों का एक हिस्सा हो जिसे बोलने वाले लोगों की पीढ़ियों द्वारा एक मूल्यवान विरासत माना जाता हो।
  • शास्त्रीय भाषा और साहित्य, आधुनिक भाषा और साहित्य से भिन्न हैं इसलिये इसके बाद के रूपों के बीच असमानता भी हो सकती है।
  • साहित्यिक परंपरा में मौलिकता हो अर्थात् उसकी उत्पत्ति किसी अन्य भाषा से ना हुई हो।
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